ज्ञान की ताक़त से गिरती अमेरिका की बादशाहत

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब विश्व व्यवस्था का पुनर्निर्माण हो रहा था, तब अमेरिकी सीनेटर जे. विलियम फुलब्राइट ने एक अनोखा सपना देखा था। यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक आदान-प्रदान की परिकल्पना थी, जो ज्ञान, समझ और शांति का वाहक हो। “फुलब्राइट प्रोग्राम” केवल एक छात्रवृत्ति योजना नहीं था, बल्कि अमेरिकी ‘सॉफ़्ट पावर’ का एक नैतिक और बौद्धिक औज़ार था। यह वह समय था, जब अमेरिका केवल हथियारों का नहीं, विचारों का भी नेतृत्व करता था। लेकिन, आज वह सपना धीरे-धीरे ध्वस्त हो रहा है। अमेरिकी शिक्षा और शोध की जड़ें भीतर से खोखली हो रही हैं, और इसका प्रभाव न केवल अमेरिका के भीतर, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।

आइए, सबसे पहले यह जानते हैं कि फुलब्राइट की शैक्षणिक और बौद्धिक विस्तार की वह परिकल्पना क्या थी और वह किस तरह अपना आकार ले रहा था ? 

फुलब्राइट दृष्टि: शिक्षा के माध्यम से विश्व-नेतृत्व

1946 में स्थापित फुलब्राइट कार्यक्रम का मूल उद्देश्य था–देशों के बीच शैक्षणिक सहयोग और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देना। यह योजना उस समय अमेरिका की वैश्विक नैतिक प्रतिष्ठा को स्थापित करने में एक केंद्रीय स्तंभ बनी। उदार लोकतंत्र, वैज्ञानिक सोच, नवाचार और मानवीय मूल्यों वाला अमेरिका का वह शैक्षणिक मॉडल पूरी दुनिया के युवाओं के लिए एक आदर्श बन गया।

अमेरिकी विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाना केवल शैक्षणिक सफलता नहीं, बल्कि वैश्विक पहचान का प्रतीक था। हार्वर्ड, एमआईटी, स्टैनफ़र्ड जैसे संस्थान ज्ञान निर्माण के मंदिर बन गए। लेकिन, अब वह गौरवशाली परंपरा संकट में है।

अमेरिका ने स्वयं ही फुलब्राइट के उन मूल्यों को नष्ट कर दिया और इसे कई तरह से अंजाम दिया गया।

शिक्षा का राजनीतिकरण

आज अमेरिका में विश्वविद्यालय राजनीतिक संघर्ष का मैदान बन चुके हैं। कई राज्यों में नस्लीय इतिहास, लिंग समानता, यौन शिक्षा आदि जैसे कुछ विषयों को पढ़ाने पर रोक लगा दी गयी है। यह स्थिति शिक्षकों की स्वतंत्रता और छात्रों की बौद्धिक परिपक्वता दोनों पर एक गहरी चोट है।

वित्तीय कटौती और बाज़ारीकरण

1980 के बाद से सार्वजनिक शिक्षा में सरकारी निवेश लगातार घटता गया। इसका परिणाम यह हुआ कि विश्वविद्यालय अब निजी कंपनियों, उद्योगों और ट्यूशन फ़ीस पर निर्भर हो गए हैं। शोध की दिशा अब सामाजिक ज़रूरतों से नहीं, बल्कि बाज़ार की मांग से तय होती है।

छात्र ऋण संकट और असमानता

अमेरिका में छात्र ऋण 1.7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। शिक्षा अब ‘सार्वजनिक सेवा’ नहीं, एक महंगी ‘निजी वस्तु’ बन गई है। ग़रीब, अश्वेत, प्रवासी या अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच पाना मुश्किल होता जा रहा है।

वीज़ा और आव्रजन नीतियों की कठोरता

ट्रंप शासनकाल के बाद से अमेरिका में वीज़ा प्रतिबंध, प्रवासी विरोधी माहौल और नौकरियों की असुरक्षा ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों को हतोत्साहित किया है। अब छात्र कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के अन्य देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

शोध में गिरावट: अमेरिका से लुप्त होता नवाचार 

एशियाई देशों का उत्थान

चीन, भारत, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश आज अनुसंधान में अमेरिका को टक्कर दे रहे हैं। इसका सिरमौर चीन बनता जा रहा है। चीन का R&D ख़र्च अब अमेरिका के बराबर है,बल्कि कुछ मामलों में तो चीन अमेरिका से कहीं आगे जाता हुआ दिखायी दे रहा है। भारत की तकनीकी प्रतिभा वैश्विक मंच पर छा रही है। पश्चिम के लिए यह एक बड़ी चेतावनी है।

सत्य का विघटन: ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग का आगमन

कोविड महामारी और जलवायु परिवर्तन के दौरान अमेरिकी समाज में वैज्ञानिकों के प्रति जो अविश्वास दिखा था, वह शिक्षा के पतन की गहरी तस्वीर है। जब शोध को झूठ और साज़िश के नज़रिए से देखा जाता है, तो ज्ञान की प्रामाणिकता समाप्त हो जाती है।

बिग टेक की शोध पर कब्ज़ा

अब गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा जैसी कंपनियाँ स्वतंत्र शोध संस्थानों से अधिक शक्तिशाली बन चुकी हैं। वे पेटेंट, डेटा और तकनीक पर नियंत्रण रखती हैं। ज्ञान सार्वजनिक नहीं, निजी संपत्ति बनता जा रहा है। इससे फुलब्राइट की “मुक्त ज्ञान” की भावना को भारी धक्का पहुंचा है।

वैश्विक परिदृश्य पर प्रभाव: अमेरिकी पतन का विश्व पर क्या असर

नैतिक नेतृत्व का ह्रास

जब अमेरिका शैक्षणिक नेतृत्व करता था, तो वह लोकतंत्र, मानवाधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता जैसी वैश्विक नैतिकता को भी परिभाषित करता था। अब जब वही देश शैक्षणिक सेंसरशिप और नस्लीय विद्वेष को बढ़ावा देता है, तो उसकी आलोचना खोखली प्रतीत होती है।

ब्रेन ड्रेन की उल्टी धारा

पहले दुनिया बौद्धिक लिहाज़ से अमेरिका की ओर प्रवाहित होती थी। अब वैज्ञानिक, शोधकर्ता और छात्र अपने-अपने देश लौट रहे हैं या जर्मनी, सिंगापुर, दुबई जैसे वैकल्पिक केंद्रों की ओर जा रहे हैं। अमेरिका अब ‘ज्ञान का केंद्र’ नहीं, एक असुरक्षित विकल्प बनता जा रहा है।

बहुध्रुवीय बौद्धिक व्यवस्था का जन्म

अब विश्व में एक ‘एकमात्र बौद्धिक केंद्र’ नहीं, बल्कि अनेक क्षेत्रीय केंद्र उभर रहे हैं। चीन के कन्फ्यूशियस संस्थान, यूरोप का एरास्मस प्रोग्राम, भारत का डिजिटल विश्वविद्यालय अभियान-ये सब मिलकर अमेरिकी वर्चस्व को तगड़ी और खुली चुनौती दे रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फुलब्राइट की लौ फिर से जल सकती है ?

अगर अमेरिका पुनः ज्ञान और विचारों का केंद्र बनना चाहता है, तो उसे गहराई से आत्मचिंतन करना होगा और उसे निम्नलिखित क़दम उठाने होंगे:

• शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा।

• शोध की स्वतंत्रता को वैचारिक हमलों से बचाना होगा।

• वैश्विक शिक्षा आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना होगा।

• निजी कंपनियों की शोध नीतियों पर निगरानी रखनी होगी।

• ज्ञान को पुनः ‘लोक-हित’ के रूप में स्थापित करना होगा।

फुलब्राइट का सपना अभी मरा नहीं है, लेकिन वह वेंटिलेटर पर ज़रूर है। यदि उसे बचाना है, तो अमेरिका को अपने बौद्धिक विवेक को पुनर्जीवित करना होगा।

जिस तरह के इस समय वैश्विक स्तर पर शैक्षणिक परिदृश्य बन रहे हैं, उनसे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह अमेरिका की बौद्धिक मृत्यु है या एक नए युग की शुरुआत है ?

अमेरिकी शिक्षा और शोध प्रणाली का क्षरण केवल एक राष्ट्रीय त्रासदी नहीं, बल्कि वैश्विक ज्ञान व्यवस्था में भारी बदलाव का संकेत है। हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं, जहां ज्ञान का सृजन बहुध्रुवीय हो रहा है। यह बदलाव यदि समानता, सत्य और सहयोग की ओर ले जाए, तो यह मानवता के लिए वरदान होगा। लेकिन, अगर यह टुकड़ों में बँटी बौद्धिक अराजकता में बदल गया, तो इसका नुक़सान संपूर्ण विश्व को होगा।

फुलब्राइट ने जो सपना देखा था, वह था- शांति और समझ का सपना। आज जब अमेरिका अपने ही बुनियादी मूल्यों से दूर हो रहा है, तो यह केवल एक कार्यक्रम का अंत नहीं, बल्कि उस शानदार विचार का अंत हो सकता है कि शिक्षा दुनिया को बेहतर बना सकती है।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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